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Wednesday, September 02, 2015

== विमर्श 03 ==

एक गीत/नवगीत .... क्या कोई बता सकता है कि इसके रचनाकार कौन हैं.... क्या इसे नवगीत कहा जा सकता है ?
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एक हाथ में हल की मुठिया
एक हाथ में पैना
मुँह में तिक-तिक बैल भागते
टालों का क्या कहना
भइ टनन टनन का गहना
सिर पर पाग बदन पर बंडी
कसी जाँघ तक धोती
ढलक रहे माथे से नीचे
बने पसीना मोती
टँगी मूँठ में हलकी थैली
जिसमें भरा चबेना
भइ गुन गुन का क्या कहना
जोड़ी लिए जुए को जाती
बँधा बँधा हल खिंचता
गरदन हिलती टाली बजती
दिल धरती का सिंचता
नाथ-जेबड़े रंग बिरंगे
बढ़िया गहना पहना
भइ सजधज का क्या कहना
गढ़ी पैंड की नोंक जमीं पे
खिंच लकीर बन जाती
उठती मिट्टी फिर आ गिरती
नोंक चली जब जाती
बनी हलाई, हुई जुताई
सुख का सोता बहता
भइ इस सुख का क्या कहना
भइ टनन टनन का गहना

-[यह रचना " विश्वनाथ राघव " की है, " धरती के गीत" संग्रह में 1959 में प्रकाशित]

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टिप्पणियाँ -


व्योम जी क्या इस सौन्दर्य बोध को आज के गाँव की पीढ़ी आस्वाद कर पायेगी?? जब कि मुझे जूए मे जुते बैलों की जोड़ी खेत की तरफ जाते हुए मूर्त हो उठे

-शिवमूर्ति तिवारी
July 1 at 9:55am
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जमीन से जुड़ा सार्थक नवगीत. कॉंवेंटी मस्तिष्क इसका रसास्वादन नहीं कर सकते, यह उनका दुर्भाग्य है

-संजीव वर्मा सलिल
July 1 at 10:16am
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बिलकुल ठेठ ग्राम्य सौंदर्य बोध से प्लावित नवगीत !रचियता का नाम जानना चाहूँगी

-रंजना गुप्ता
July 1 at 7:01pm
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यह भी एक प्रयोग है... कि क्या किसी रचना की कथ्य, शैली.... से किसी रचनाकार को पहचाना जा सकता है..... क्या हम उन्हीं रचनाकारों को सहजता से पहचान पाते हैं जिनकी रचनाएँ विभिन्न कोर्स की किताबों में आ गई.... थोड़ी माथापच्ची करें तो नाम मिल जायेगा..... देखते हैं कि कौन सही रचनाकार तक पहुँच पाता है.... जो पहले पहुँच पाता है उनके लिए "नवगीत २०१३" पुरस्कार स्वरूप भेजी जायेगी......

-जगदीश व्योम
July 1 at 10:33am
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हां यह गीत है।नवगीत कहें तोभी उतना ही सार्थक।सदाबहार गीत।शहरी गीतकार भी इसे पसन्द करेंगे बशर्ते उन्हें लोक जीवन लोक संस्कृति की थोड़ी समझ हो।कृपयारचनाकार का नाम बताएं

-रमाकान्त यादव
July 1 at 10:33am
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रचनाकार की भाषा तो बाबा नागार्जुन या त्रिलोचन जैसी लग रही है

-प्रदीप शुक्ल
July 1 at 10:44am
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खेती किसानी में पैना, पैंड़ शब्दों का प्रयोग इधर अवध क्षेत्र में होता हो, लगता नहीं है, मुझे लगता है यह नईम, दिवाकर वर्मा या गुलाब सिंह में से किसी का हो सकता है। हालांकि इनके अधिक नवगीत पढ़ने का सुयोग नहीं मिल पाया मुझे। जब कोई नवगीत गीत के मानक पर भी खरा उतरे तो उसका क्या कहना। नवगीतों में लय गेयता और प्रवाह का निर्वाह दुष्कर है। बढ़ते शहरीकरण और जड़ों से कटने के कारण लोकसंप्रक्ति से दूरी नवगीतों में नयी कविता जैसा शब्दाडम्बर पैदा कर रही है। "'भाई भइ टनन टनन का गहना" एक अभिनव प्रयोग है, क्योकि नवगीत का मुखड़ा तो- एक हाथ में हल की मुठिया
एक हाथ में पैना
मुँह में तिक-तिक बैल भागते
टालों का क्या कहना से ही पूरा हो जाता है। पर गहना (घंटा) का प्रयोग जहां इसे नवगीत बना देता है, वहीं "'भाई टनन टनन का गहना" की अतिरिक्त पंक्ति लोकसंप्रक्ति से लपेट देती है। पाठक को खेत जुताई का सम्पूर्ण विम्ब अद्भुत है। मेरी दृष्टि में यह मानक नवगीत है। गीत तो है ही।

-रामशंकर वर्मा
July 1 at 11:24am
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मुझे रचनाकार का तो पता नहीं पर इस गीत को पढ़ कर मन अत्यंत आनंदित हो गया. ऐसे गीत को खोज लाने के लिये व्योम जी आपको बधाई

-सन्तोष कुमार सिंह
July 1 at 12:31pm
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आदरणीय व्योम जी, विषयवस्तु और शैली के हिसाब से तो इसे 500 फीसद नवगीत ही माना जाना चाहिए। रचनाकार का मुझे पता नहीं। लेकिन जो भी है उसे शत् शत् नमन

-ओमप्रकाश तिवारी
July 1 at 1:06pm
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मेरा अध्ययन अत्यल्प है किन्तु मैं आदरणीय नचिकेता जी का नाम लेना चाहूँगा। उनके कुछ गीत मैंने पढ़े हैं। कुछ-कुछ वैसी ही शैली लग रही है।

-शुभम् श्रीवास्तव ओम
July 1 at 1:29pm
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Nirmal Shukla आदरणीय !
यह नवगीत है भाषा तथा शिल्प के हिसाब से महेश अनघ सम्भवत: इसके रचनाकार हैँ...........

-निर्मल शुक्ल
July 1 at 2:03pm
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रचनाकार का नाम खोजने का थोड़ा और प्रयास करें... बाबा नागार्जुन, त्रिलोचन, नईम, दिवाकर वर्मा, गुलाब सिंह, नचिकेता, महेश अनघ ... इनमें से इस गीत का कोई रचनाकार नहीं है

-जगदीश व्योम
July 1 at 3:32pm
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व्योम जी आप और कितनी धैर्य की परीक्षा लेंगे..बता ही दीजिए मुझे लगता है कि संभवत: ये रमेश रंजक जी का जनगीत हो सकता है।..मैने इसे कहीं सुना या पढा है पर याद नही

-भारतेन्दु मिश्र
July 1 at 6:30pm
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जी भारतेन्दु जी... बताता हूँ जल्दी ही...... रमेश रंजक जी का नहीं है..... .

-जगदीश व्योम
July 1 at 9:01pm
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कहीं कैलाश गौतम तो नहीं

-रामशंकर वर्मा
July 1 at 10:13pm
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शुभम् श्रीवास्तव ओम जगदीश सर कहीं इसके रचयिता स्वयं आप ही तो नहीं। हम सभी के धैर्य की परीक्षा लेना बंद करें और रहस्य पर से अनावरण करें

=शुभम् श्रीवास्तव ओम
July 1 at 10:31pm
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रमाशंकर जी कैलाश गौतम जी का गीत नहीं है

-जगदीश व्योम
July 2 at 9:22am
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 शुभम जी, मेरा तो जन्म भी नहीं हुआ था जब यह रचना प्रकाशित हुई

-जगदीश व्योम
July 2 at 9:24am
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 कही निराला जी तो नही

-रंजना गुप्ता
July 2 at 9:56am
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शुभम् श्रीवास्तव ओम आदरणीय जगदीश सर। सही उत्तर चाहे जो भी दे किन्तु नवगीत-2013 की सर्वाधिक आवश्यकता मुझ प्रवेशार्थी को ही है। अत: आप मुझे सही उत्तर मैसेज बाक्स में दें। मैं उसे पटल पर रख देता हूँ

-शुभम् श्रीवास्तव ओम
July 2 at 1:04pm
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भाई जी अब तो बता ही दीजिये। बहुत अच्छा अभ्यास और नए-पुराने गीतकारों का स्मरण इस बहाने से हो गया

-रामशंकर वर्मा
July 2 at 5:23pm
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एक बात जो मेरे मन में आ रही है कि कोई अच्छा गीत/नवगीत पाँच दशक या और भी अधिक समय तक अपरिचित बना रहता है यदि उसके रचनाकार को कोई बड़ा पुरस्कार नहीं मिल पाता है अथवा आलोचना के मठाधीशों की कृपा नहीं होती .....
दूसरी बात यह कि यदि कोई गीत/नवगीत प्रभावशाली है तो वह कभी न कभी पाठकों की पसंद बन ही जाता है.... गीत का रचनाकार कौन है यह जाने बिना भी..... इस रचना को बिना नाम के होने पर भी नवगीत के वरिष्ठ रचनाकारों ने भरपूर सराहा बिना यह जाने कि यह किसका लिखा हुआ है ..... इस बहाने एक भूला बिसरा नवगीत चर्चा में आ सका... आप सभी का आभार......
यह रचना " विश्वनाथ राघव " की है, " धरती के गीत" संग्रह में 1959 में प्रकाशित।

-जगदीश व्योम
July 3 at 5:26am
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 वाह ! आपके कोष के क्या कहने !

-राजेन्द्र वर्मा
July 3 at 7:47am
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Jagdish Vyom क्या विश्वनाथ राघव के विषय में किसी को कोई जानकारी है

-जगदीश व्योम
July 3 at 5:03pm
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 वाह व्योम जी आप तो ऐसे ही श्रेष्ठ गीतो का खजाना दोस्तो को दिखाते रहें।मैने सन 1984 मे म.प्र. सरकार के कृषि विभाग द्वारा संकलित -धरती के लाल -शीर्षक गीत संग्रह मे किसानी के गीतो मे किसान जीवन के अनेक गीत पढे हैं,उसमे ..हे ग्राम देवता नमस्कार/सोने चांदी से नही किंतु /तुमने मिट्टी से किया प्यार ।..जैसी रचनाए भी थीं।संभवत:तभी कहीं इसे पढा है।तब मै ललितपुर के जखौरा ब्लाक मे प्रौढशिक्षा विभाग मे पर्यवेक्षक था ।लेकिन राघव जी की यह रचना है इस रूप मे मुझे याद नही आता।..बहरहाल किसान चेतना का बेहतरीन गीत तो ये है ही। राघव जी के बारे मे थोडा विस्तार कीजिए तो और अच्छा लगेगा।

-भारतेन्दु मिश्र
July 3 at 7:16pm
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जी भारतेन्दु जी, आप गीतों पर जैसी पैनी दृष्टि रखते हैं वह अनुकरणीय है..... राघव जी के विषय में मेरे पास और जानकारी नहीं है...... यह संग्रह मेरे पास है... खोजता हूँ ...... इसी बहाने कुछ चर्चा गीत नवगीत पर होती रहे ....

-जगदीश व्योम
July 4 at 10:19am
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मुझे गीति रचना इसलिए भी अच्छी लगी क्योंकि में ग्रामीण परिवेश में ही पला बढ़ा और वर्षों रहा हूँ ,शेष रचनाकार का नाम रहस्य में रखकर विमर्श करने कराने का यह प्रकार अधिक नहीं भाया
उस पर भी जाने माने लोग अनुमान ज्ञान में शून्य सावित हुए वह भी अकारण सीधी बात होनी चाहिए थी।

-मनोज जैन मधुर
July 3 at 9:40pm
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आदरणीय व्योम जी यह विडम्बना है गीत प्रकाशित होना एक बात है और प्रकाश में आना अलग बात है इसी तरह से कितने और रचनाकार होंगे और न जाने कितने और गीत होंगे जो ऐसे ही प्रकाशित होते हुए भी अप्रकाशित रह गये होंगे .....जब तक कहीं चर्चा न हो तब तक तो वे समय के गर्त में ही माने जायेंगे....जब तक कहीं किसी संज्ञान में नहीं आयेंगे तब तक इस संबंध में किसी का भी अनुमान शून्य ही होगा.....आप के द्वारा नवगीत काल के आरंभिक दिनो के इस नवगीत को पाठकों एवं मेरे जैसे विद्यार्थियों तक पहुचाने हेतु आभार.......

-निर्मल शुक्ल
July 3 at 11:01pm
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तीनों नवगीत दशकों के 30 नवगीतकारों में से आधो का नाम भी लोगों को शायद न मालूम हो। शुक्ल जी सही कह रहे हैं,गीत अपने आप में कठिन साधना है और नवगीत आधुनिक समय में उस कठिन साधना के परिणाम स्वरूप उपजा नवनीत है।..अब आज के कवियों में शब्द छन्द रस अर्थ बोध के स्तर तक पहुंचने का अवकाश नहीं बचा है। युगीन सत्य को गीत में उतार पाना किसी समय में कतई सहज नहीं रहा।..हम आज कम पढ़ने वाले ज्यादा कहने वाले मंच गोंचने वाले मित्रों से रूबरू हैं और इस अकविता के नए युग में खड़े हैं।

-भारतेन्दु मिश्र
July 4 at 7:08pm
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